✍गांव के बुजुर्गों का सम्मान
महाराणा प्रताप जी की 480 वीं जयंती के अवसर पर बुजुर्गों को समर्पित मेरा यह लेख..🙏🙏
इस लेख के माध्यम से मै अपने गांव के बड़े बुजुर्गों केे उस सपने पर प्रकाश डालूंगा जिसे अब लगभग तीन दशक बाद पूरा कर उनको सम्मान दिया गया है...
हमारे गांव के विकास में हमारे गांव के बड़े बुजुर्ग हमेशा तत्पर रहा करते थे, उनका एकमात्र सपना था कि गांव का चौराहा, जो इस गांव की शोभा बढ़ाया करता है वहां पर वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जिनकी शौर्य और वीरता जग जाहिर है उन की भव्य प्रतिमा लगे, ताकि हमारी भावी संताने प्रेरणा लेंं सके, हमारे गांव के प्रगति और लोकप्रियता का प्रकाश पूरे क्षेत्र में फैले।
गांव के बुजुर्ग एकजुट होकर कदम दर कदम आगे बढ़ रहे थे, कई वर्षों के प्रयास के बाद अंततः अपने सपनों को साकार करने का समय भी निश्चित कर लिया, नियत समय पर भूमि पूजन और नींव रखने की व्यवस्था की गई, प्रतिमा लगाने में बहुत सारे धन की आवश्यकता थी जो पूरा नहीं हो पा रही थी, उसे पूरा करने हेतु कुछ बड़े नामी-गिरामी श्वेत वस्त्र धारी चेहरो को भूमि पूजन में आमंत्रित किया गया, ताकि उनके हाथों शिलान्यास संपन्न हो और कम पड़े धन की व्यवस्था भी हो सके। लेकिन अफसोस इस बात की हुई कि वे लोग आए जरूर, शिलान्यास भी संपन्न हुआ परंतु अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों के जाल में गांव वालों को फंसा कर वे सफेद वस्त्र धारी चलते बने, जो कुछ भी धन इकट्ठा हुआ था वह भी इनके सेवा सत्कार में खर्च हो गए और धनाभाव के कारण बुजुर्गों का सपना धराशाई हो गया, देखते-देखते कई वर्ष बीत गए। कुछ बुजुर्ग तो स्वर्ग भी सिधार गए😢... जहां भूमि पूजन हुआ था, नीव दी गई थी उस नीव का नामोनिशान मिटता जा रहा था।
फिर वहां सड़क का निर्माण कार्य शुरू हुआ... उनके सपनों के साथ नए युवा चेहरे निर्माण कंपनी से चौराहे पर डिवाइडर की मांग कर डिवाइडर बनवा दिए, फिर निव का कार्य कर वहां पर महाराणा प्रताप जी का साधारण पोस्टर लगा दिया गया और फिर से प्रतिमा लगाने की पुरजोर कोशिश की जानें लगी परंतु इस बार भी बात नहीं बनी और यह कोशिश भी बेकार जाने लगी, लेकिन गांव के कुछ जुझारू युवा, हार मानने को तैयार नहीं थे क्योंकि यह सपना, सपना नहीं बल्कि बुजुर्गों का सम्मान था, जिसे हम लोग किसी भी कीमत पर पाना चाहते थे, इसके लिए कई बैठकें कर धन एकत्रित करने की योजना तैयार की गई, हर महीने पैसा जमा किया जाने लगा परंतु इससे तो और कई वर्ष लग जाते। एक युवा तो इसके लिए अपनी नौकरी तक छोड़कर गांव आ गया और प्रतिमा लगाने के बाद ही शहर नौकरी के लिए जाने की प्रण कर लिया था। प्रयास जारी रहा, अंततः युवाओं के सहयोग के लिए एक सज्जन आगे आए, जिनके सहयोग और युवाओंं के करी मेहनत के बाद भव्य प्रतिमा लगाने का कार्य प्रारंभ हो गया, एक बार फिर से दिन निश्चित हुआ और इस बार सफलता भी मिला।
भूमि पूजन के लगभग तीस वर्षों के लम्बे अंतराल के बाद वह दिन भी आया, जिस दिन प्रतिमा लगाया जा रहा था, पूरे क्षेत्र के लोग एकत्रित होकर अविश्वसनीय दृश्य को देख रहे थे, उनकी आंखें बुजुर्गों के सम्मान में नम थे, अब जाकर उनका सपना पूरा हुआ था, काश वे सब जीवित होते...😢
आज अपने इस लेख के माध्यम से मैं उस सज्जन सहित उन सभी युवाओं का धन्यवाद करना चाहता हूं, जिन्होंने गांव के बुजुर्गों के सम्मान में कदम दर कदम मिलाया और आगे भी ऐसे कदम उठाते रहें, जिससे गांव के विकास के साथ-साथ सम्मान भी बढ़े।
अब युवा महाराणा प्रताप जी की आने वाली 480 वीं जयंती 9 मई का इंतजार करने लगे। इस दिन इस गांव में जश्न का माहौल होगा, परंतु चीन के वुहान से ऐसा वायरस निकला है कि वैश्विक महामारी का रूप ले लिया है। इस वैश्विक महामारी की वजह से पूरा देश लॉक डाउन हो गया है, सामाजिक गतिविधियों की बंदिश हो गई हैं।
आज 9 मई 2020 महाराणा प्रताप जी की 480 वीं जयंती मनाई जा रही है, सभी से अनुरोध किया गया है कि सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुए महाराणा प्रताप जी की जयंती पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन करें।
🙏🙏धन्य है वे लोग जिन्होंने बुजुर्गों के सपनों का सम्मान किया...
शत शत नमन🙏🙏🙏
जय हिंद ...जय महाराणा ...जय भवानी...
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🏡घर पर रहे, सुरक्षित रहें
✍रोशन सिंह ,गंगपुर सिसवन
🙏🙏
ReplyDeleteबुजुर्गो के सम्मान में प्रकाशित यह लेख सचमुच अविस्मरनीय है, उनके सपनों को साकार कर युवाओ ने यह साबित किया है कि इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता है ।एक बार फिर से युवा संगठन ने यह दर्शाया है कि वक्त हमारा है, हमारे
ReplyDeleteबुजुर्ग भोले- भाले हो सकते हैं हम नहीं, अब सफेदपोशो कि बारी है सावधान हो जाये, वर्ना खैर
नहीं,अब उनकी नहीं हमारी बारी है। यह लेख हमारे देश के युवा वर्ग के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
अपने बुजुर्गों के सम्मान का सबक हमारे भावी पीढ़ी के लिए एक धरोहर साबित होगा ।लेखक का यह लेख पढकर रामनरेश त्रिपाठी जी की यह
पन्क्ति याद आती हैं- अतुलनीय जिनके प्रताप का
साक्षी है प्रत्यक्ष दिवाकर।
घूम घूम कर देख चुका है जिनकी निर्मल कीर्ति निशाकर।
सच,आज हमें किसी के दया कि जरूरत नहीं, अगर जरूरत है तो अपनी आंतरिक शक्ति को
पहचानने और उसे एकत्रित करने की।
इस लेख के लिए लेखक को बारम्बार आभार प्रकट करते हुए युवाओं को शत शत नमन है।
आशा करते हैं कि आगे भी अपने अनमोल लेख
के द्वारा हमारे समाज को सही दिशा निर्देश प्रदान
करेंगे। धन्यवाद।
एकता में ही बल है, युवा संगठन जिन्दाबाद
ReplyDeleteFrom-Shiva Singh
Very Inspiring notes for the Youth....described well.
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